जाति के बवाल पर सवाल!

अद्भुत, आश्चर्यजनक या फिर हास्यास्पद !
जिस जाति के नाम से सारी सुविधाएँ चाहिए,
जिस जाति में जन्म लेने के कारण आप योग्य हो या अयोग्य, आपको सारे लाभ मिल रहें है,
उसी जाति के नाम से यदि कोई आवाज़ लगा दे तो उसे फ़ौरन गिरफ़्तार कर लो।
कोई सुनवाई नही ना ही कोई रिपोर्ट या एफ. आइ. आर।
अरे भाई ऐसा तो तब भी नही होता जब कोई लड़की अपने प्रति कोई दुर्व्यवहार की शिकायत करती है।
उस बेचारी पीड़ित को उस शर्मनाक हालात में भी गवाह लाने को कहा जाता है।
तो क्या किसी को उसकी जाति के नाम से पुकारना बलात्कार से भी बड़ा अपराध है।
ज़रा सोचिए तो!
कोर्ट ने केवल तत्काल गिरफ़्तारी पर रोक लगाई है।
क़ानून का ग़लत इस्तेमाल हो रहा था।
निरपराधी जेल जा रहे थे।
अब बस शिकायत की पहले जाँच होगी फिर कार्यवाही, तो इतना बवाल क्यूँ ?

 

समस्या ये है कि दलित वर्ग अपने आप को शोषित और पिछड़ा मानते हुए आरक्षण चाहता है प्रत्येक क्षेत्र में।
मिल भी रहा है पर वो ये नही समझ रहे कि ये सुविधा ही उनकी शत्रु है।
उन्हें आरक्षण का लोभ देकर आज तक सभी राजनीतिक दल अपना वोट बैंक पक्का करते है।
दूसरी ओर, यदि कोई योग्य दलित भी उच्च पद पर पहुँच जाता है तो उसकी योग्यता को नही अपितु उसे मिलने वाली जातिगत सुविधा को माना जाता है।
इसी आरक्षण के कारण वे समाज से अलग थलग है, स्वर्ण जाति वाले उन्हें अपना दुश्मन समझते है।
पर दलित समाज यथार्थ से परिचित नही है।
वो अपना ख़ुद का शोषण करवा रहें है नेताओ द्वारा जो उन्हें बस अपना वोट बैंक मानते है।
क्यूँ नही दलित समाज अपने बल पर कुछ करता?
क्यूँ नही कह देता नही चाहिए हमें आपकी दया?
बाबा साहब अपने बल पर संविधान के निर्माता बने।
हमारे देश के राष्ट्रपति भी एक दलित है और अपनी योग्यता के दम पर है।
तो फिर आज ७० साल बाद भी क्यूँ दया चाहते है !
क्यूँ नही सारी सुविधाएँ लेने से मना कर सर उठा कर जीने का, ख़ुद को साबित करने का प्रयास करते?
आगे आइए!! अपने आपको बस वोट बैंक ना बनने दें।
ज़िम्मेदार नागरिक बने,
सर उठा कर जीएँ!

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