अगर गौरी लंकेश बीजेपी विरोधी थीं, तो वो पत्रकार कैसे हुईं… पत्रकार तो निष्पक्ष और तटस्थ होता है।

मीडिया बता रहा है कि कर्नाटक के बेंगलुरु में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या सिर्फ़ इसलिए करदी गई क्योंकि वो बीजेपी की मुख़र विरोधी थीं, यही नहीं आरोप तो ये तक लगाए जा रहे हैं कि इसके पीछे हिंदुत्ववादी संगठन हैं। लेकिन, बड़ा सवाल ये है कि अगर गौरी लंकेश सिर्फ पत्रकार थीं तो वो सिर्फ बीजेपी और हिंदुत्ववादी संगठनों की विरोधी क्यों थीँ। आख़िर कर्नाटक सरकार उनके निशाने पर कभी क्यों ंनहीं आई, क्या उन्हें उसी राज्य की क़ानून व्यवस्था पर पूरा भरोसा था, लेकिन संयोग देखिए उसी कर्नाटक की लचर क़ानून व्यवस्था ने उनकी ही जान ले ली।

एक्टिविस्ट पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की जितनी निंदा की जाए कम है. कौन इसे ठीक कहेगा. लेकिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के समय से ऐसी घटनाएं समाज के कुछ पूर्वाग्रही लोगों और वर्ग विशेष के लिए एक ऐसे मौके की तरह होते हैं जिनका तत्काल और अंधा इस्तेमाल करने का लोभ संवरण ये नहीं कर पाते. इनकी प्रतिक्रियाओं में संबंधित व्यक्ति से संवेदना कम किसी विचार विशेष को लेकर रोष अधिक दिखता है.

ऐसी हत्याओं के पीछे कौन है, हत्या का कारण क्या है इसका फैसला जांच से पहले कर देना कहां तक उचित है? क्या यह जांच को प्रभावित करने, सायास या अनायास किसी व्यक्ति या संबंधित सरकार को बचाने और एक विचार के पक्ष में बिना सुबूत खड़े होने का भी मामला नहीं बनता है.?

भारत जैसे लोकतंत्र में परसेप्शन पर खूब खेल होता है. वैसे तो ऐसे मामलों में संबंधित सरकार का फायदा न हो तो फैसला लंबे समय तक नहीं आता (कर्नाटक उदाहरण है). फैसला आ भी जाए तो (महात्मा गांधी की हत्या के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने आर एस एस को दोषी नहीं पाया) आप अनंत वर्षों तक झूठ बोल सकते हैं.

सोने पे सुहागा यह कि चीख-चीख कर झूठ बोलने वाले इस बात का भी रोना रोते हैं कि उन्हें बोलने नहीं दिया जा रहा.

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