प्रधानमंत्री मोदी का लाल किला से सम्बोधन एक नयी शुरुआत ,एक नयी पहल का आगाज है

आज़ादी के 70 वें सालगिरह पर प्रधानमंत्री मोदी का लाल किला से सम्बोधन एक नयी शुरुआत ,एक नयी पहल का आगाज है । नए भारत के संकल्प के साथ कश्मीर पर सरकार का दृष्टिकोण कश्मीरियत से लवरेज है जिसमे हिंसा की कोई जगह नहीं होगी। “गाली से न गोली से बात बनेगी गले लगाने से प्यार की बोली से ” क्या वाकई में ऐसे हालत कश्मीर में है या प्रधानमंत्री ने इस दर्शन को आगे रखकर एक नयी शुरुआत का मन बनाया है ?

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याद कीजिये “बम से न गोली से बात बनेगी बोली” से अटल जी के दौर में तत्कालीन सी एम मुफ़्ती मोहम्ममद सईद ने यह नारा दिया था। कश्मीर में एक नयी पहल की जीद अटल जी ने की थी ।याद दिलाने की जरूरत यह भी है कि अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में मिलिटेंसी इससे ज्यादा गंभीर थी। श्रीनगर अस्सेम्ब्ली और संसद पर अटैक उन्ही के दौर में हुआ था लेकिन वाजपेयी ने कश्मीर में अपना तार कभी टूटने नहीं दिया। जो लोग कहते थे अब्दुल्लाह के बिना कश्मीर नहीं ,बिना रिगिंग के वोट नहीं वहा फ्री एंड फेयर इलेक्शन करवाकर गैर अब्दुल्लाह फैमिली के शख्स को शासन में आने का मौका उन्होंने फ़राहम कराया। पहली बार यहाँ जम्हूरियत को मजबूती मिली। हिज़्ब के टॉप कमांडर मजीद डार को बातचीत के टेबल पर लाया गया और तो और हुर्रियत लीडरान अपनी नुमाइंदगी साबित करने के लिए चुनाव प्रक्रिया में भी शामिल होने लगे। पी एम मोदी एक बार फिर उसी संवाद के तार को संगीत देने की कोशिश की है।

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पिछले एक वर्ष में हिज़्बुल मुजाहिद्दीन के चार टॉप कमांडर मारे गए हैं। बुरहान वानी की मौत के बाद लगा कि कश्मीर में अलगाववाद ने दुबारा अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। पथरबाजो की हिंसक प्रतिक्रिया ने सुरक्षाबलों की मुश्किलें बढ़ा दी थी। और इस घटना से उत्साहित पाकिस्तान ने बुरहान वानी को ही अपना आदर्श बना लिया था। लेकिन एक साल बाद हालत इस कदर बदले कि हिज़्ब के टॉप कमांडर यासीन इत्तू उर्फ़ गजनवी के मौत पर लोगों की भीड़ तो जरूर उमड़ी लेकिन भीड़ खामोश थी ,पथ्थरबाज नदारद थे। जाहिर है सबजार भट्ट ,अबू दुजाना और गजनवी तीन बड़े दहशतगर्दो के एक महीने के अंदर मौत ने कश्मीर के बदले हालत पर मुहर लगा दी है। बचा कुछा कसर एन आई ए ने हुर्रियत के हवाला फंडिंग और ब्लड मनी के फ्लो को चॉक करके पूरी दी है।

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स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री की अपील सही मौके पर लिया गया परिपक्व फैसला है। हर मसले का हल बातचीत से हो सकता है। लेकिन धारा 35 A पर सुप्रीम कोर्ट का रुख कश्मीर पर एक नयी सियासी बहस तेज जरूर दी है. आज अपनी सत्ता पर खतरे की आशंका ने सैयद अली शाह गिलानी से लेकर फ़ारूक़ अब्दुल्लाह तक संविधान की दुहाई देकर सी एम् मेहबूबा साथ खड़े दिखना चाहते हैं। जाहिर है बदले हालत में पी एम मोदी ने समाधान का एक रास्ता दिखाया है।

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