गोरखपुर में 1978 से अब तक 1 लाख मासूमों ने दम तोड़ा है… शर्म से हमारी तीन पीढ़ियों के नेताओं को डूब मरना चाहिए

5 दिनों में 60 बच्चो की मौत ! जिम्मेदार कौन ? सन 1978 से 1 लाख बच्चों ने गोरखपुर के इसी बी आर डी मेडिकल कॉलेज ,हॉस्पिटल में दम तोडा है। तो इस शर्म से हमारे तीन पीढ़ियों के नेताओं को डूब मरना चाहिए। उत्तर प्रदेश के 7 जिले और बिहार के तीन जिलों में मानसून सीजन में हर साल हजारो बच्चो पर इंसेफ्लाइटिस / ब्रेन फीवर मानो काल बन कर टूटता है और हर साल 700 -800 बच्चो को अपनी माँ के आँचल से छीन लेता है। तक़रीबन 3 करोड़ की आवादी वाले पूर्वांचल के इन जिलों में एक मात्रा यह हॉस्पिटल अपने टूटी फूटी व्यवस्था से हजारो माताओ को यह आस्वस्त करता रहा कि उसका बच्चा जरूर घर लौटेगा लेकिन अक्सर माँ अपने सूनी आँचल के साथ ही घर लौटती है। वजह इलाके के नीम /हाकिम से इलाज कराकर ,थके हारे माता पिता बी आर डी मेडिकल कॉलेज के शरण में आता है लेकिन अफ़सोस इन 40 वर्षो में इस महामारी से लड़ने के लिए हमने बिलखते माताओ को अकेले छोड़ दिया।

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मीडिया आज सी एम योगी से जवाब मांग रहा है ,माँगना चाहिए क्योंकि वे आज मुख्यमंत्री हैं और 20 वर्षो से गोरखपुर का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं लेकिन सवाल उन साबिक मुख्यमंत्रियों से क्यों नहीं जो पार्क बनवाने में हजारो करोड़ खर्च कर देते थे ,पार्क में टूयब लाइट लगवाने में सैकड़ो करोड़ खर्च कर डालते थे । यहाँ तक कि एक मुख्यमंत्री पार्क में साप पकड़ने के लिए 12 करोड़ खर्च कर डाला था। लेकिन पूर्वांचल में गंदगी में जीने को अभिशप्त लोगों के लिए एक तिनका भी खर्च नहीं हुआ जो हुआ उसे सत्ता के दलालो ने लूट लिया। पूर्वांचल की यह बिमारी सोच से पैदा हुई महामारी है। जिसका इलाज सिर्फ सोच बदलने से ही होगा। यह मैं न्यूज़ पेपर /टीवी की खबरों के आधार पर नहीं कह रहा हूँ। मैंने पूर्वांचल की हालत को नजदीक से देखा है। जहाँ सबसे बड़ी जरुरत सोच बदलने की है।

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आज का मीडिया ने सिर्फ मौके पर ताली /डफरी बजाने का काम ले लिया है जो कभी एक पेशेवर (ताली वजाने )का हुआ करता था। हुकूमत के लिए सौन्द्रीयकरण प्राथमिकता थी ,मीडिया के लिए टी आर पी। नौकरशाहों और दलालो के लिए केंद्रीय योजनाए .. ऐसे में गोरखपुर के एकमात्र हॉस्पिटल में वक्सीनेशन की व्यवस्था है कि नहीं ,मरीजों के लिए बेड बढ़ाये गए या नहीं यह पूछने वाला कोई नहीं था। तीन साल पहले इंडिया 24x 7 चैनल के एडिटर वासिंद्र मिश्रा जी ने बदहाल पूर्वांचल पर एक सीरीज चलाया था। हमारे लिए यह एक चैलेंजिंग असाइन्मेंट था लेकिन ग्राउंड ज़ीरो से हमारे रिपोर्टरस ने जो तस्वीर भेजी थी वह किसी सभ्य समाज के लिए कलंक हो सकती थी । चारो ओर गंदगी के अम्बार के बीच पल रहे मासूम की आयु रेखा यह गंदगी ही खींचती नजर आती थी। हद तो तब हो गयी जब तत्कालीन मंत्री जी को पूर्वांचल पर कहने के लिए कुछ नहीं था. क्या मीडिया पूर्वांचल में गंदगी के खिलाफ अभियान छेड़ने में अपने आज के तेवर को जारी रखेगा? शायद नहीं ! आज जगह जगह सियासत में प्रार्थना सभा हो रही है। वाकई गोरखपुर में प्रार्थना की जरूरत है। मौत की गिनती और सियासत करने के वजाय अगर हम इन 60 बच्चो को शहीद मानले ,जिन्हे हमारी गंदगी और लूट ने मारा है,जो हमारी व्यवस्था को थू थू करके चला गया है, ।

स्वच्छ भारत अभियान ही इसका एक मात्र विकल्प है। पी एम मोदी का यह संकल्प जमीनी स्तर पर कुछ चमत्कार ला सकता है,लोगों की सोच बदल सकता है । हुकूमत मीडिया में प्रतिक्रिया देने के वजाय , कुछ महीने टीवी देखने के वजाय पूर्वांचल में युद्धस्तर पर स्वछता आंदोलन चलाये तो और किसी मां का गोद सुना नहीं होगा। लेकिन यह काम टीवी के कैमरे के सामने नहीं होगा ,इसके लिए मीडिया की चमक से दूर स्वच्छाग्रही बनना होगा।

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