कश्मीर के हालात पर अटल जी का पिघला था दिल… ये कविता लिख बयां किया था दर्द

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    Sharess

सवेरा है मगर पूरब दिशा में

घिर रहे बादल

रुई से धुंधलके में

मील के पत्थर पड़े घायल

ठिठके पांव

ओझल गांव

जड़ता है ना गतिमयता

स्वयं को दूसरों की दृष्टि से

मैं देख पाता हूं

न मैं चुप हूं न गाता हूं

समय की सदर सांसों ने

चिनारों को झुलसा डाला, मगर हिमपात को देती

चुनौती एक दुर्ममाला,

बिखरे नीड़, विहंसे चीड़

आंसू हैं ना मुस्कानें, हिमानी झील के तट पर

अकेला गुनगुनाता हूं, न मैं चुप हूं न गाता हूं

अटल

ये वो लाइनें जिन्हें 90 के दशक में देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कश्मीर के तत्कालीन हालात पर लिखा था।  लेकिन, मौजूदा वक़्त को देखें तो स्थिति बहुत ज़्यादा भिन्न नज़र नहीं आती।

पहले जम्मू-कश्मीर पुलिस के जांबांज अफ़सर फ़िरोज़ डार और फिर अब मरहूम डीएसपी मो. अयूब पंडित का मार दिया जाना इस बात का सबूत है कि घाटी सुलग रही है। हालात बेकाबू हैं, और इन सबकी वज़ह बने अलगाववादी अपनी करतूतों से बाज़ नहीं आ रहे हैं। पाकिस्तानी मदद से अलगाववादी और हुर्रियत अपनी राजनीति को आंदोलन का नाम देकर चमका रहे हैं और इनके लिए पुलिस और सरकार महज़ तमाशा बनकर रह गई है।

कश्मीर में लोकतांत्रिक सरकार ज़रूरी है, और जम्हूरियत पर लोगों का भरोसा कायम हो इसके लिए रियासत में पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी ने फ्री एंड फेयर इलेक्शन को पुख़्ता बनाया था। अटल जी कश्मीर में शांति, प्रगति और खुशहाली चाहते थे और कश्मीर समस्या का हल वो इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरीयत के साथ करना चाहते थे। अटल जी ने संविधान के दायरे से आगे बढ़कर इंसानियत के दायरे में बातचीत की पहल की थी, जिस पर विपक्ष का भी उनको सहयोग मिला। लेकिन, करगिल घटना के बाद अटल जी की कश्मीर नीति को काफी झटका लगा, फिर भी बातचीत का सिलसिला नहीं टूटा।

19 अप्रैल 2003 को कश्मीर यूनिवर्सिटी में तत्कालीन पीएम अटल जी ने अपने संबोधन में कहा कि, अलगाववाद, आतंकवाद का कश्मीर के सामाजिक इतिहास, सांस्कृतिक  पहचान और आध्यात्मिक परंपरा से कोई संबन्ध नहीं है। कश्मीर भी शेष भारत की तरह सभी धार्मिक धाराओं और संस्कृतियों का सम्मान करने वाला है। लेकिन, अटल जी की इस ख़ूबसूरत सोच साकार हो घाटी के कुछ मुट्ठी भर लोग कभी नहीं चाहते की, ऐसा हो।

क्योंकि, अटल जी ने संविधान के दायरे से आगे बढ़कर इंसानियत के दायरे में बातचीत की पहल की थी। आज भी कश्मीर पर केंद्र की पॉलिसी लगभग वही है।

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