जब RSS से अभिभूत हुए पंडित नेहरू… 1963 की गणतंत्र दिवस परेड में स्वयंसेवकों को किया था शामिल

अजय मित्तल- जब कांंग्रेस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ख़िलाफ़ मुखर विरोध अपनाए हुए है और महज़ विरोध की ख़ातिर किसी भी हद तक जाने को तैयार है। ऐसे दौर में कांग्रेस को कम से कम अपने पूर्वजों से सीख लेनी चाहिए, जब  54 साल पहले कांग्रेस के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने राष्ट्र निर्माण में RSS के स्वयंसेवकों की सराहना की थी। जब 60 के दशक में चीनी आक्रमण के दौरान तत्कालीन PM पंडित नेहरू ने साल 1963 की गणतंत्र दिवस की परेड में RSS के स्वयंसेवकों को विशेष रुप से शामिल किया था।

1963 में गणतंत्र दिवस की परेड में RSS स्वयंसेवक
1963 में गणतंत्र दिवस की परेड में RSS स्वयंसेवक

ये RSS के द्वितीय सरसंघचालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर जिन्हें गुरुजी नाम की उपाधि थी, की ही दूरदृष्टि और राष्ट्र के लिए समर्पण का भाव था कि, चीनी आक्रमण की शुरुआत के साथ ही RSS स्वयंसेवक युद्ध प्रयत्नों में जनता का समर्थन जुटाने और उनका मनोबल दृढ़ करने में जुट गए। गुरु जी के समायिक सहयोग के महत्व को पंडित नेहरू को भी स्वीकार करना पड़ा और पं. नेहरू ने 1963 में गणतंत्र दिवस के पथ संचलन में कुछ कांग्रेसियों की आपत्ति के बावजूद RSS के स्वयंसेवकों को भाग लेने के लिए आमंत्रण भिजवाया। जिसमें 3,500 गणवेषधारी स्वयंसेवकों ने घोष की ताल पर कदम से कदम मिलाकर पथ संचलन किया।

RSS के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी
RSS के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी

इस दौरान, लाल किले की प्राचीर से गुरुजी ने अपने संबोधन में वक़्त के संकेतों से पहले ही भविष्य के लिए स्पष्ट संदेश दिया कि RSS और स्वयंसेवकों के लिए राष्ट्र सर्वोपरि है और राष्ट्रहित में जो RSS को जो भी करना पड़ेगा वो करेगा।

दरअसल, 60 के दशक की पूर्वसंध्या का वो दौर जब चीन के साथ लगातार जारी संघर्ष नवंबर 1959  में हिंसक हो गया था और लद्धाख के कोंगकाला में पहली बार चीन ने ख़ून ने बहाया, जिसके बाद विश्वस्तर पर भारत को कमजोर आंका गया। यहां तक की भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन ने भी अपनी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए और  चीन पर आसानी से विश्वास करने और वास्तविकताओं की अनदेखी के लिए नेहरु सरकार को कठघरे में खड़ा किया। पंडित नेहरू ने भी माना कि गलतियां हुईं थी और उन्होंने संसद में खेद जताते हुए कहा था कि ‘हम आधुनिक दुनिया की सच्चाई से दूर हो गए थे और एक बनावटी माहौल में रह रहे थे, जिसे हमने ही तैयार किया था’।

(लेखक, राष्ट्रदेव पत्रिका के संपादक हैं)

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