ये खाट का दौर है साहब!

ये खाट का दौर है साहब।

युवराज ने आज उत्तर प्रदेश में अपनी खाट यात्रा शुरू तो की लेकिन उन्होंने बात फिर भी वही करी जिससे उनकी खुद खाट खड़ी हो जाती है। लोन माफ़, बिजली माफ़ की आदतों की वजह से ही पिछली बार लोगो ने उनका सूपड़ा साफ़ कर दिया था। खैर तब भी बाज नहीं आये, आते कैसे..माँ ने पहले ही कह दिया था बेटा सत्ता जहर है। तब से ही बेटे ने ठान रखी है की सत्ता से दूर ही रहना है। जहर का घूँट पीकर ही सत्ता दिलाने वाले कांट्रेक्टर प्रशांत किशोर को माँ ने बड़ा बेटा मानकर गोद ले लिया था। अब किशोर ने बड़ी ही रद्दीनिति के साथ राहुल जी के लिए खाट बिछाई थी, खाट की शर्त पर ही भीड़ भी इकट्ठी की थी। लेकिन लोगों ने इलेक्शन मैनेजमेंट को खाट मैनेजमेंट में बदलते हुए परिवार के हरेक व्यक्ति के ऊपर एक एक खाट लाद दी। जिसके हाथ जो लगा वो ले गए।

एक बुजुर्ग ताऊ ने वो खाट ले जाने से बिलकुल मना कर दिया जिस पर राहुल जी बैठे थे। ताऊ बोले, “ये खाट तो दस जनपथ पर भेज देनी चाहिए, शायद अगले चुनाव के बाद सभी रजवाड़े खाट पर आ जायें।” ताऊ की माने तो वो राहुल जी को देखने आ गए थे वरना उन्होंने अपने बेटे के समाजवादी लैपटॉप से समाजवादी स्मार्टफोन के लिए पहले ही रजिस्ट्रेशन करा दिया था। ताऊ को भी पता है पहले आटा-चावल से वोट मांगे जाते थे अब स्मार्टफोन का जमाना है। डाटा भी फ्री ही मिलेगा। इसी वजह से लालू जी ने बेटे की चिकौटी काटते हुए बोला था, हमने अपने ज़माने में बहुत चारा खाया था, अब डाटा का जमाना है.. तुम भी कुछ हजार लाख करोड़ जीबी डाटा इधर उधर करो वरना कार्यकर्ता डाटा की फिरौती मांगनी शुरू कर देंगे। हाल ही में खबर भी आई थी, पटना के डाक्टर से अपहरणकर्ताओं ने पचास लाख जीबी डाटा माँगा है। खैर, हम बिहार में क्यों पहुँच गए.. बिहार में बाढ़ तो उत्तर प्रदेश से ही आई थी। और अगर यूपी चुनाव में केवल 6 महीने नहीं होते तो किसी समाजवादी योजना के तहत उत्तर प्रदेश के साढ़े तीन मुख्यमंत्री सारा बाढ़ का पानी गटक जाते और डकार लेने के लिए नेताजी को आगे कर देते। इससे बाढ़ भी नहीं आती और नदी के पठार में समाजवादी जिलाध्यक्ष का आलिशान बंगला बन चुका होता। चूँकि, समाजवादियों के दिमाग में दिन भर खाली प्लाट का कैलकुलेशन चलता रहता है तो मियां खां के मुंह से भी निकल गया की अगला टारगेट नीली छतरी का प्लाट है। अब वैसे भी नीली छतरी के नीचे कोई रुकने को भी तैयार नहीं है, इसलिए बहन जी भी हरे पर ही निगाहें गढ़ाए बैठी हैं। हरे हरे कागजों के बदले करीब सौ लोगों को हरे टिकेट बाँट दिए। पता उन्हें भी है, अभी जो हरी है बस वो ही फसल कट सकती है वरना जनता ने तो पहले ही तय कर लिया है की रंग दे तू मोहे गेरुआ। खैर, लुट्येंस दिल्ली के गलियारों में महंगे सोफे पर बैठकर किसी समय गेरुए वालो को गाली देने वाले आज खाट बिछाकर नतमस्तक हुए पड़े हैं।

अब खाट का दौर जो है। :-

Ankur Dhaka

अंकुर दिल्ली विश्विद्यालय से पढ़े, राजनीतिक विश्लेषक एवं व्यंग्यकार हैं। वे @ankurdhaka से ट्वीट करते हैं|

2 Comments

  1. Nidhi
    September 7, 2016 - 10:17 am

    बहुत खूब अंकुर जी

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  2. Bairaagi Yayavar
    September 11, 2016 - 6:56 pm

    हाँ ये आर्टिकल पूरा पढ़ने लायक है कारण कि हिन्दी में है दूसरा कि समझ में आ रहा है।।
    खटिया काण्ड तो बदला है गाँव वालों का। इतने सालों तक जो लॉलीपॉप चुसाया है लोगों ने सपने दिखा दिखा कर उसी का परिणाम है ये। अब गाँव का आदमी आपका कम्प्यूटर हैक तो करेगा नहीं। वो तो मेड़ो और बभनौटी- चमरौटी में से ही आजतक नहीं निकल पाया है। तो ये बाग़ी होने का पहला चरण है। बहुत हुआ सम्मान।
    अब तो खटोला वही बिछेगा जहाँ भोले चाहेंगे।।

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